नई दिल्ली में शनिवार को संसद की विभिन्न स्थाई समितियों (स्टैंडिंग कमेटियों) के पुनर्गठन की घोषणा के साथ ही ममता बनर्जी का खेमा संसद के भीतर और अधिक कोलाहल और असहज स्थिति में घिरता नजर आ रहा है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन द्वारा किए गए इस बड़े फेरबदल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कई प्रमुख नेताओं को समितियों के चेयरपर्सन पद से हटा दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद কালীঘাট (ममता बनर्जी) खेमे में हलचल तेज हो गई है और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी तथा डेरेक ओ’ब्रायन ने अलग-अलग पत्र लिखकर इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। संसद की नई कमेटियों की सूची सामने आने के बाद स्पष्ट हुआ कि खनि व इस्पात समिति के प्रमुख अनुराग ठाकुर और वित्त समिति के प्रमुख भर्तहरि महताब बनाए गए हैं। वहीं, ममता-समर्थक टीएमसी सांसद डोला सेन को वाणिज्य संबंधी संसदीय समिति के चेयरपर्सन पद से हटाकर उनकी जगह बीजेपी के सुधांसु त्रिवेदी को जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा, रसायनों और उर्वरक संबंधी समिति के प्रमुख रहे कीर्ति आजाद को भी हटा दिया गया है। उनकी जगह पर उस नेता को मौका मिला है जो कभी टीएमसी में थे लेकिन बाद में एनसीपीआई (NCPI) में शामिल हो गए। इस बदलाव के बाद राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं।द डायमंड हार्बर से सांसद और टीएमसी के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी ने इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर तीखा विरोध दर्ज कराया है। अभिषेक ने अपने पत्र में उठाया है कि जो 20 सांसद टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में शामिल हो चुके हैं और जिनकी सदस्यता खत्म करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है, उन्हें इस तरह महत्वपूर्ण पदों पर क्यों नवाजा जा रहा है। उन्होंने मांग की है कि कमेटियों के पुनर्गठन में किए गए इन नए विवादित नियुक्तियों को तुरंत खारिज किया जाए और पुराने मनोनीत सदस्यों को उनके पदों पर बहाल किया जाए। उधर, राज्यसभा में टीएमसी के मुख्य सचेतक डेरेक ओ’ब्रायन ने भी राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखा है। डेरेक ने सवाल उठाया है कि उच्च सदन में तृणमूल कांग्रेस तीसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसके सदस्यों को लगातार क्यों वंचित किया जा रहा है। अपने पत्र में उन्होंने कई अन्य महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हुए संसद में पार्टी के अधिकारों की अनदेखी किए जाने का गंभीर आरोप लगाया है। इस पूरी कवायद को ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव को राष्ट्रीय स्तर पर सीमित करने की एक बड़ी रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ जहां केंद्र सरकार और संसदीय अधिकारियों ने प्रशासनिक आधार पर कमेटियों का फेरबदल बताया है, वहीं टीएमसी इसे तानाशाही रवैया करार दे रही है। आने वाले संसद सत्र में इस मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्षी टीएमसी के बीच तीखी तकरार देखने को मिल सकती है।
