पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज की है। इन नतीजों के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रही गुटबाजी भी चर्चा में आ गई है। पार्टी दो धड़ों में बंटी हुई है और दोनों ने अलग-अलग चुनावी पहचान के साथ अपनी ताकत आजमाई। हालांकि, दोनों गुट बीजेपी के मुकाबले काफी पीछे रह गए। इसके बावजूद दोनों के प्रदर्शन की तुलना करें तो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को दूसरे धड़े की तुलना में अधिक वोट मिले। इसी वजह से इस पूरे घटनाक्रम को TMC के भीतर की राजनीतिक लड़ाई के एक अलग पहलू के तौर पर देखा जा रहा है। नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी की उम्मीदवार हसीरानी रथ ने 1,64,427 वोट हासिल किए और 1,22,753 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को 41,674 वोट मिले। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन दिया था। दूसरी ओर, डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार एहतेशमिल हक को महज 853 वोट मिले। इस तरह नंदीग्राम में ममता समर्थित उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे, जबकि दूसरे TMC गुट का उम्मीदवार काफी पीछे छठे स्थान पर रहा।  मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर सीट पर बीजेपी के शंकरराव सरकार ने 1,29,914 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के उम्मीदवार गोलाम नबी आजाद को 54,098 वोट मिले। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी को 3,847 वोट हासिल हुए, जबकि डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार शफीउज्जमान शेख को 2,044 वोट मिले। इस सीट पर भी दोनों गुट बीजेपी और अन्य प्रमुख उम्मीदवारों के मुकाबले काफी पीछे रहे। TMC के भीतर पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठन पर नियंत्रण को लेकर विवाद चल रहा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े ने पार्टी पर अपना-अपना दावा पेश किया था। विवाद के बीच चुनाव आयोग ने उपचुनाव से पहले दोनों गुटों को TMC के आधिकारिक नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों को अलग पहचान और चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरना पड़ा।  उपचुनाव के नतीजों ने TMC के दोनों गुटों की चुनावी स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं। ममता बनर्जी लंबे समय से पार्टी का प्रमुख चेहरा रही हैं, लेकिन इस बार दोनों सीटों पर उनके गुट को जीत नहीं मिली। वहीं, दूसरे गुट को भी अपने संगठनात्मक आधार को वोटों में बदलने में सफलता नहीं मिली। राजनीतिक विश्लेषणों में इस विभाजन को विपक्षी वोटों के बिखराव और पार्टी के संगठनात्मक संकट से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, केवल दो उपचुनावों के आधार पर पूरे राज्य में किसी गुट की लोकप्रियता का अंतिम आकलन करना उचित नहीं होगा।  इन उपचुनावों के बाद अब दोनों गुटों की निगाहें आगामी राजनीतिक मुकाबलों पर रहेंगी। पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और समर्थकों को एकजुट रखने की चुनौती बनी हुई है। रेजिनगर में दोनों गुटों को मिले कम वोट और नंदीग्राम में ममता समर्थित उम्मीदवार तथा दूसरे गुट के उम्मीदवार के बीच बड़ा अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि दोनों की चुनावी स्थिति एक जैसी नहीं रही। हालांकि, भविष्य में दोनों गुटों की राजनीतिक ताकत कैसी होगी, यह आगामी चुनावों और संगठनात्मक घटनाक्रमों से ही स्पष्ट हो सकेगा।