अरावली पहाड़ों में माइनिंग को लेकर मोदी सरकार की बेचैनी फिर बढ़ गई है। इस बार पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत को लेटर लिखकर अरावली में माइनिंग पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का रिव्यू करने की रिक्वेस्ट की है। सोशल एक्टिविस्ट ने यही लेटर प्रेसिडेंट द्रौपदी मुर्मू को भी भेजा है। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में कहा गया है कि 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंचाई वाली अरावली पहाड़ियों की ज़मीन और आसपास की ढलानों को पूरी तरह से सुरक्षित रखा जाएगा। इसका मतलब है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां सुरक्षा के दायरे में नहीं आएंगी। हालांकि, अरावली की 90 परसेंट पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंचाई की हैं। चीफ जस्टिस और प्रेसिडेंट को लिखे अपने लेटर में हितेंद्र गांधी ने पहाड़ियों की ऊंचाई के आधार पर फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, अरावली के लिए ऊंचाई के आधार पर तय किया गया क्राइटेरिया अनजाने में उत्तर-पश्चिमी भारत के पर्यावरण की सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। पर्यावरण एक्टिविस्ट ने लेटर में बताया कि 20 नवंबर के फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि ‘अरावली पश्चिमी भारत की प्राकृतिक ढलान है’ महत्वपूर्ण है। लेकिन हितेंद्र ने 100 मीटर की ऊंचाई पर खुदाई की इजाज़त पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि पूरी अरावली रेंज पश्चिमी भारत की प्राकृतिक सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।