मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था को मजबूत करने में अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाली भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी ज्यूरिस्ट नावानेथम ‘नावी’ पिल्ले (Navanethem ‘Navi’ Pillay) को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। नार्वे की नोबेल समिति ने शुक्रवार को इस ऐतिहासिक सम्मान का ऐलान करते हुए कहा कि 88 वर्षीय नावी पिल्ले ने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालतों तक मानवाधिकारों की रक्षा में अभूतपूर्व भूमिका निभाई है। वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक बार फिर इस पुरस्कार की रेस में निराशा हाथ लगी है। नावी पिल्ले का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक साधारण भारतीय तमिल परिवार में हुआ था। उनके दादा तमिलनाडु से दक्षिण अफ्रीका जाकर बसे थे। रंगभेद (Apartheid) के कठिन दौर में विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और नेटाल प्रांत में अपनी लॉ प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनीं। वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी कानून फर्म की स्थापना की और रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं को कानूनी मदद देना शुरू किया। बाद में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से उन्होंने ज्यूरिडिकल साइंस में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की और 1995 में दक्षिण अफ्रीका के हाईकोर्ट की जज नियुक्त हुईं। वर्ष 1999 में नावी पिल्ले को रवांडा के लिए बने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल (ICTR) का जज और अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वहां उन्होंने नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराधों के मामलों की सुनवाई के दौरान एक मील का पत्थर स्थापित किया। उन्होंने युद्ध और नरसंहार के दौरान होने वाली यौन हिंसा और बलात्कार को केवल अपराध नहीं, बल्कि ‘नरसंहार के एक हथियार’ के रूप में परिभाषित करने में मुख्य भूमिका निभाई। इसके बाद वे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (ICC) में भी जज के रूप में सेवा दे चुकी हैं। वर्ष 2008 से 2014 तक नावी पिल्ले ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (UN High Commissioner for Human Rights) के रूप में वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों की आवाज़ बुलंद की। इसके अलावा 2021 से 2025 तक उन्होंने अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्षता की। 2019 में म्यांमार के खिलाफ नरसंहार के आरोपों से जुड़े मामले में उन्हें अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में तदर्थ (Ad-Hoc) जज भी नियुक्त किया गया था। इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी काफी चर्चा में था, लेकिन नोबेल समिति ने उनके दावे को दरकिनार करते हुए नावी पिल्ले के नाम पर मुहर लगाई। पुरस्कार के तहत 1 करोड़ 20 लाख स्वीडिश क्रोनर (लगभग 1.2 मिलियन डॉलर) की राशि प्रदान की जाएगी। आगामी 10 दिसंबर को अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि के अवसर पर नार्वे की राजधानी ओस्लो में एक भव्य समारोह के दौरान नावी पिल्ले को यह सम्मान दिया जाएगा। नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने नावी पिल्ले के जीवन भर के कार्यों की सराहना की है। जेनेवा में यूएन मानवाधिकार कार्यालय की प्रवक्ता शबिया मंटू ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आज के दौर में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए और अधिक निष्ठा और जवाबदेही की आवश्यकता है, और नावी पिल्ले का जीवन पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है।