अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों पर करारा तंज कसा। दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर यूएन विशेषज्ञों की आलोचना का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि यूएन विशेषज्ञ उनका पसंदीदा विषय है। रुबियो ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूएन विशेषज्ञ शब्द ही ऑक्सीमोरॉन यानी विरोधाभास है। उन्होंने इस टिप्पणी के माध्यम से विशेषज्ञों की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठा दिया। यह बयान पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिया गया। रुबियो के इन शब्दों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूएन की भूमिका को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। अमेरिका का यह रुख भारत के प्रति उसके बढ़ते समर्थन को भी दर्शाता है। रुबियो ने दिल्ली प्रदर्शनों पर कोई टिप्पणी करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह भारत का घरेलू राजनीतिक मामला है और वे इस पर राय नहीं देंगे। रुबियो ने जोर देकर बताया कि भारत एक लोकतंत्र है जहां चुनाव होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका में भी रोजाना प्रदर्शन होते रहते हैं इसलिए किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों पर राय देना उचित नहीं। इस बयान से साफ है कि अमेरिका भारत की आंतरिक प्रक्रियाओं का सम्मान कर रहा है। रुबियो का यह रुख उन आवाजों के विपरीत है जो भारत के घरेलू मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय टिप्पणी करना चाहते हैं। दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग के बीच यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदर्शनों को सामान्य प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन आम बात है और इसे घरेलू स्तर पर ही सुलझाया जाना चाहिए। रुबियो ने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा जताते हुए किसी भी बाहरी हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखी। उनके अनुसार हर लोकतांत्रिक देश में इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं। अमेरिका स्वयं में भी नियमित प्रदर्शन होते हैं इसलिए भारत के मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाना गलत होगा। यह बयान अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संप्रभुता के सम्मान को रेखांकित करता है। रुबियो के शब्दों ने भारत की आंतरिक स्थिरता पर बाहरी टिप्पणियों के खिलाफ संतुलित रुख पेश किया। इससे पहले जिनेवा में बीस से अधिक यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने दिल्ली में युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों पर पुलिस की कथित कठोर कार्रवाई को लेकर चिंता जताई थी। विशेषज्ञों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई को बार-बार भारी हाथ वाला बताया था। उन्होंने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करने और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों पर न्याय सुनिश्चित करने का आग्रह किया था। विशेषज्ञों के अनुसार प्रदर्शन मुख्य रूप से युवाओं द्वारा किए जा रहे थे। इन टिप्पणियों को भारत ने एकतरफा और अधूरी जानकारी पर आधारित करार दिया था। यूएन विशेषज्ञों के बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा पैदा की थी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र पर चुनिंदा देशों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने जबरन गायब किए जाने संबंधी कार्य समूह के एजेंडे पर चर्चा के दौरान भारत की संवैधानिक और संस्थागत सुरक्षा व्यवस्था का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से निपटने के लिए मजबूत संवैधानिक और संस्थागत तंत्र मौजूद हैं। भारत ने साफ कहा कि अधूरे आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि खराब करने के प्रयास स्वीकार्य नहीं। यह रुख मानवाधिकार मंचों पर निष्पक्षता की मांग को रेखांकित करता है। भारत का स्पष्ट संदेश है कि सहयोग आधारित संवाद ही सही मार्ग है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करते हुए कहा कि वह मानवाधिकार संरक्षण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उप सचिव ने संवैधानिक प्रावधानों और संस्थागत तंत्रों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी आरोप की जांच के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है। भारत का मानना है कि बाहरी टिप्पणियां तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए न कि चुनिंदा सूचनाओं पर। रुबियो के बयान और भारत के रुख से साफ है कि दोनों देश घरेलू मामलों में बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। यह विकास भारत-अमेरिका संबंधों में आपसी विश्वास को और मजबूत करने वाला साबित हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का संकेत मिला है।
