पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बचाव में उतर आये हैं. रविवार को शुभेंदु अधिकारी ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मुद्दे पर बढ़ते राजनीतिक विवाद के बीच निर्वाचन आयोग का बचाव किया. राज्य में 27 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाये जाने के लिए बंगाल के चीफ मिनिस्टर ने राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया . मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि इन नामों को हटाये जाने के लिए न तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और न ही निर्वाचन आयोग को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. अधिकारी ने शनिवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच हुई बैठक और उसके बाद निर्वाचन आयोग की ओर से जारी बयान का भी हवाला दिया. उन्होंने इस आरोप को खारिज किया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़े फैसले सीईसी ने एकतरफा तरीके से लिये गये थे. बंगाल के चीफ मिनिस्टर ने कहा कि तीनों निर्वाचन आयुक्तों की बैठक से स्पष्ट होता है कि ये फैसले सर्वसम्मति से लिये गये थे. शुभेंदु अधिकारी ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में कहा- 27 लाख नाम हटाये जाने की जिम्मेदारी ममता बनर्जी की है, भारतीय जनता पार्टी या निर्वाचन आयोग की नहीं. उनके द्वारा दायर एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद न्यायिक अधिकारियों ने यह फैसला लिया था. शुभेंदु अधिकारी का यह बयान ममता बनर्जी द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर अपना हमला तेज किये जाने के एक दिन बाद आया. ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि एसआईआर का इस्तेमाल भाजपा को बंगाल पर कब्जा करने में मदद करने के लिए किया गया. ममता ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी की थी. निर्वाचन आयोग ने शनिवार को कहा कि एसआईआर से संबंधित सभी आदेशों को तीनों निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मत मंजूरी मिली थी. मतदाता पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 में किये गये बदलावों को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था. आयोग ने यह स्पष्टीकरण निर्वाचन आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद और मतदाता सूची से नाम हटाये जाने की चिंताओं के बीच दिया. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्तों के बीच मतभेद होने की खबरों के बाद हुई अपनी पहली बैठक के बाद आयोग ने एक बयान में कहा कि निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा कैबिनेट सचिव को भेजे गये पत्र प्रतिनियुक्ति पर आये एक अधिकारी से संबंधित थे, न कि नीतिगत या सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) प्रभाग से जुड़े मामलों से. निर्वाचन आयोग की ये टिप्पणियां अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की उस खबर की पृष्ठभूमि में आया, जिसमें कहा गया था कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े फैसलों पर कई मौकों पर आपत्ति जतायी थी. हालांकि, निर्वाचन आयोग ने कहा है कि आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान मतभेद सामने आना सामान्य है और उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिये गये हैं. बंगाल के मुख्यमंत्री ने निर्वाचन आयोग के भीतर सामने आये कथित मतभेदों और आयोग की ओर से सार्वजनिक रूप से दिखायी गयी एकजुटता के बीच अंतर को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की. उन्होंने तर्क दिया कि आयोग की एकजुटता विपक्ष के इस दावे को कमजोर करती है कि एसआईआर की प्रक्रिया केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इशारे पर आगे बढ़ायी गयी. इस मुद्दे के राजनीतिक मायने काफी महत्वपूर्ण हैं. निर्वाचन आयोग द्वारा उच्चतम न्यायालय में दाखिल आंकड़ों के अनुसार, बंगाल में एसआईआर के दौरान हटाये गये 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक ने अपने नाम बहाल करने के लिए अपील की है. निर्वाचन आयोग ने कहा है कि मृत, स्थानांतरित और दोहरे नाम जैसी श्रेणियों तथा अन्य विसंगतियों के सत्यापन के बाद ये नाम हटाये गये. शुभेंदु अधिकारी ने इस मुद्दे को मुख्य रूप से वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव के जनादेश को लेकर राजनीतिक लड़ाई के रूप में पेश किया. उन्होंने कहा- अगर केरलम में एसआईआर अच्छा है, तो पश्चिम बंगाल में यह खराब क्यों है? हमने 208 सीट जीती हैं, जबकि दोनों पक्षों (तृणमूल कांग्रेस और उसके सहयोगियों) के पास 80 सीट हैं. ममता बनर्जी जनता के फैसले को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं.